एक ख़्वाब

कल सारे फूल खिल गए थे,मैंने सबको जीवित देखा ,हँसते, खेलते...कल उस जगह सच में मुरझाते सच में वो सब घट गया था,जो कभी वहां नहीं घटा था।मैंने कितनो को मरते देखा कितनो को रोते,तो कितनो को हँसते और आख़िर में सब कुछ ख़त्म हो गया...और फिर हँसने और रोने वाले पता नही किस सन्नाटे  में खो गए.....एक ऐसा सन्नाटा जो सिर्फ महसूस किया जा सकता है।
सफ़र में नदी को देखना ,पेड़ के पत्तो को हिलते हुए देखना , एक सूनसान सड़क पर कुछ दूर तक चलते जाना,फिर बहुत सारे ख़यालो का आना ,और फिर उन सब में उलझ जाना ...लगता कुछ मिल गया लेकिन उस मिलने में लगता कि सब तो छूट गया है ।
फिर एक चाय और सिगरेट का धुंवा वो सब याद करना कि क्या मिला था....जिससे मुझे इतनी ख़ुशी मिली थी ...
वो जो इतना कुछ मिला ....अगर उन सबको मिला दूं तो शायद एक रजनीगंधा के फूलों की एक माला तैयार हो जाएगी ...जिसमें सिर्फ खुशबू ही खुशबू  होगी।

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