अनकही


अभी हमने बातें शुरू ही की थी, की मन में एक बेचनी सी होने लगी ….तभी मैं अपने कमरे की खिड़की के पास आकर बाहर नीले आसमान को देखने लगा …देखते देखते आसमान का नीला रंग कब काले बादलों में घुल गया पता ही नहीं चला और बारिश शुरू हो गयी….जब भी कोई सुख अपने चरम पे घटता है तो कुछ ऐसा ही होता है हमे पता नहीं चलता की कब हम हँसने लगते है उस बारिश की तरह…..मैं कहाँ खो गया मुझे पता नहीं चला और तभी  दूसरी तरफ से आवाज़ आई… do you know ….black is your favourite colour…. मैंने खुद को आईने के सामने पाया …सब कुछ जैसे मिल गया हो….मेरी बात बारिश की बूँदें और खुद मैं भी ….मैं बिलकुल अपने जैसे मुक्त रहना चाहता था,जैसे मैं आईने में दिख रहा था…. मेरे चारो तरफ बहुत सन्नाटा था और अन्दर उतना ही शोर, मैं बहुत बेचैन हो रहा था ख़ुद से मिलना चाह रहा था…. मगर ये जो न मिल पाने की टीस में जो ख़ुशबू मुझे अन्दर-अन्दर ही बहुत सुन्दर ख़ुशी दे रही थी, उसका सुख अलग है मेरे लिए “सब कुछ मिल जाना ही तो प्रेम नही है कुछ छूट भी तो जाना चाहिए” मेरा बोलना मेरा सुनना और कुछ न बोलना और मेरा सब कुछ सुन लेना….मैं मुस्कुरा रहा हूँ आईने को देखकर और सोच रहा हूँ ये जो नया संबंध जो मेरे और उस आईने के बीच बन रहा है… वो कुछ ऐसा है जब हम कुछ बहुत सुन्दर पढ़ते है तो मन में लगता है की अब इसे छोड़ दो नहीं तो जब ये ख़तम होगा तो बहुत तकलीफ होगी क्यूंकि सारा सुन्दर जब घट चुका होता है तो सुकून का दर्द असहनीय हो जाता है ….ख़ुशी की बेचैनी में कितनी बेवकूफियां होती है और मैं खुद को आईने में देख रहा हूँ कुछ यूं जैसे मैं नहीं ये तुम हो …तुम ही तो हो जिससे मैं मिलना चाहता हूँ|

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