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किरदारों से बातचीत
मैं शायद लिखना भूल गया हूँ,या ये कहूं की काफ़ी दिन से कुछ लिखा नहीं तो शायद ऐसा महसूस हो रहा है....और ये कोरा कागज़ मुझे कुछ भी लिखने नहीं दे रहा है इसको देखते ही मन में एक बेचैनी सी भर जाती है और फिर मैं पहले अपने चारो तरफ पूरा माहौल बनाता हूं लिखने का, या खुद को लेखक वाला फील देने के लिए ....जैसे गैस पे चाय चढ़ा दी.... हाथ में सिगरेट जला ली और स्पीकर पे चोपिन का स्लो पियानो लगा दिया और वापिस किचन में आ गया ....ये क्या तभी मेरी नजर किचन की खिड़की से सामने वाले घर के बालकनी पर पड़ी....एक लड़की बैठी है वहाँ वो शाम के डूबते सूरज को देख रही थी और मैं उसे....उसके चेहरे पर पड़ रही सूरज की लालिमा उसको और खूबसूरत बना रही थी शायद उसको शाम के डूबते हुए सूरज की लालिमा बहुत पसंद होगी क्युकी अक्सर मैं उसको इस वक़्त वहीँ पर देखता हूँ वो हमेशा इस समय अपनी बालकनी पर आती है और मैं अब चाय बनाने के बहाने उसको देखने के लिए और तभी मुझे महसूस हुआ की उसकी नज़र अब मेरी तरफ है.... मुझे पता ही नहीं चला ये कब हुआ.... मैं थोडा असहज हो गया और खिड़की से थोड़ा पीछे हट गया....मेरी नज़र चाय पर पड़ी मेरी चाय उबल रही थी, और मैं जल्दी से चाय छानकर अपनी टेबल पर आ गया और मेरा ध्यान लैपटॉप की स्क्रीन पर गया, देखता हूं वो कोरा कागज़ शब्दो के जाल से भर चुका है... मैं मुस्कुराते हुए वहीँ बैठ गया और चाय पीने लगा मेरे दिमाग़ में उस लड़की की वो आँखें घूम रही थी जिन्होंने मुझे उसको चोरी से देखते हुए पकड़ लिया था तभी मुझे महसूस की कहानी बन तो रही रही है हाँ ये सही प्लॉट है इसे ऐसे ही चलने देते हैं मैंने इसी तरह कई दिन बिताये या कह लें की महीने उसको भी शायद ये महसूस हो गया की मैं उसे देखने आता हूँ और धीरे धीरे कब वो आने लगी मुझे देखने के लिए बालकनी में न उसे इस बात पता चला न मुझे अब हम दोनों समय से एक दुसरे को देखने के लिए आने लगे अन्दर एक गुदगुदी सा अहसास था जो हम दोनों को महसूस हो रहा था कभी कभी एक दुसरे को देख के हम मुस्कुरा भी देते थे..... कभी कभी मैं जब मैं किचन में चाय बनाने जाता तो देखता की वो पहले से वहाँ खड़ी है और मुझे ये अहसास करवाती इधर-उधर देख के की "देखो तुम ये न समझना की मैं तुम्हे देखने के लिए आई हूँ ऐसा बिलकुल नहीं है".....और मैं मुस्कुरा के ये बताता की "मैं समझ गया हूँ की अब तुम उस सूरज के लिए नहीं मेरे लिए आती हो" और तुम मुझे इगनोर करके ये बताती की "अरे जाओ मैं तुम्हारे लिए नहीं आती हूँ" ... और जब कभी कभी जान बूझ के कुछ मिनट मैं लेट आता और खिड़की से कुछ दूर पीछे खड़ा होक तुम्हे देखता की तुम मुझे न देख सको उस वक़्त तुम और भी खुबसुरत लगती थी मुझे वो तुम्हारे चेहरे की शिकन, तुम्हारा उछल के मुझे देखना की कहाँ हो अभी तक आये क्यूँ नहीं फिर जैसे ही सामने आ जाता तुम एकदम स्थिर हो जाती जैसे मुझे जानती ही न हो.... मुझे बड़ा मज़ा आने लगा था....ये सिलसिला कई दिनों तक चला मुझे बहुत अच्छा लग रहा था क्युकी मेरी कहानी आगे बढ़ चुकी थी की अचानक तुमने आना बंद कर दिया या शायद कहीं चली गयी होगी मुझे नहीं पता मैंने कई दिनों तक खिड़की पर घंटों तुम्हारा इंतज़ार किया फिर एक दिन अचानक पता नहीं क्या हुआ.... जब मैं वापिस कमरे में गया उस दिन काफ़ी लेट भी हो गया था... मेरे अन्दर एक अजीब सी बेचैनी थी .... काफ़ी रात हो चुकी थी तभी अचानक संगीत का स्वर बदल गया chopin का ही कोई स्लो म्यूजिक बज रहा था... रात और गहरी हो चुकी थी मुझे महसूस हुआ कि मैं कितनी देर से ख़ुद से बातचीत कर खुद को एक लेखक जैसा महसूस कर रहा हूं और मेरी कहानी शायद अधूरी न रह जाए इस बात के डर ने मुझे चारो तरफ से घेर लिया और मुझे लगने लगा की "यार उसको आना पड़ेगा अपनी बालकनी पर वापिस मुझे जानना है उसे.... उसका नाम या उसके बारे में हर वो बात जो मेरी इस कहानी को पूरा करेगी" काफ़ी दिन बीत गये वो मुझे दिखाई नहीं पड़ रही थी शायद वो कहीं बाहर गयी है तभी मैंने अपनी इस कहानी को यहीं पर रोक कर उसके सहारे छोड़ दिया की जब वो आयेगी तब ये कहानी आगे बढ़ेगी.... मुझे ऐसा लगता है "एक लेखक जब एक कहानी की यात्रा पर होता है तो उसके किरदार ही उसके दोस्त, उसके साथी, उसके हमसफ़र बन जाते हैं और साथ-साथ लेखक उस कहानी के पात्रों को धोखा भी दे रहा होता है अपने अन्दर एक नयी कहानी को जन्म देकर जिसका जिक्र वो अपनी उस नयी कहानी के पात्रों से इसलिए नहीं करता क्युकी उसे लगता है जब इनका रोल खतम हो जायेगा तो वो उसे छोड़ कर चले जायेंगे.....और शायद कुछ कहानियों के पात्र ये समझ जाते हैं की उनका लेखक उन्हें ही धोखा दे रहा है शायद इसलिए कुछ कहानियाँ अधूरी रह जाती हैं और लेखक की वो यात्रा अधूरी रह जाती है जिसका उन्हें हमेशा अफ़सोस रहता है" तभी अचानक जैसा किसी ने मुझे जगा दिया हो मेरी नींद खुली मैंने घडी देखा बारह बज रहे थे लैपटॉप खुला वर्डपैड का खाली पन्ना मेरे सामने था "मेरे सारे किरदार वहाँ पर नहीं थे..... सिर्फ मैं था... मैं ...इस यात्रा से निकल कर वो सब कही चले गये" मैंने एक गहरी सांस ली उठकर फ्रीज से एक बोतल निकाली पानी पिया और काफ़ी देर तक वहीँ खड़ा सोचता रहा कुछ तभी फ़ोन पर किसी का मैसेज आया मैंने देखा आकृति का मैसेज था "कहानी पढ़ी मैंने तुम्हारी अच्छा लिखने लगे हो keep writing" मैंने "thanks" लिखा फिर कुछ सोचकर वापिस सीन करके छोड़ दिया.... वापिस टेबल पर आकर स्क्रीन के सामने वर्डपैड का वो खाली पन्ने को काफ़ी देर तक देखता रहा जैसे सब कुछ भूल गया मैं .... दिमाग शून्य की तरफ चला गया... मुझे महसूस हुआ काफ़ी देर से मैं एक ही जगह बैठा हूँ मैंने सिगरेट और लाइटर ली और बालकनी में आ गया बाहर सूनसान सड़क... लैम्पपोस्ट की लाइट रोड के किनारे लगे पेड़ हवा से झूमते हुए मेरे कानों में हल्का-हल्का chopin का म्यूजिक.... मैं बहुत फ्रेश फील कर रहा था ..... मैं यही सोचते सोचते कब सो गया मुझे पता ही नहीं चला की मेरे कुछ किरदार मुझे मिल नहीं रहे हैं या जो मिले हैं वो कहानी को पूरी नहीं होने दे रहे हैं .....तो क्या मुझे किरदार बदल देने चाहिए? या इस कहानी को अधुरा ही छोड़ दूं? ................या फिर एक दूसरी यात्रा पर निकल जाऊं?
प्रिय सौरभ, वाकई अच्छा लिखा है तुमने। मानव साहब के लेखन की झलक हर लाइन में मुझे महसूस हुई.. बेहतर से बेहतरीन की तरफ़ बढ़ते रहो। शुभकामनाएं...अरुण।
ReplyDeleteअद्भुत।
ReplyDelete👌👌👌
ReplyDeleteबढ़िया,अधूरा मत छोड़ो,पूरा करो।
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