Restart

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घर में एक अजीब सा सन्नाटा महसूस हो रहा था सभी को, कोई किसी से कुछ भी बात नहीं कर रहा था। माँ को छोड़ कर बाकी सबको पता था कि इस घर में ये सन्नाटा क्यूँ है। वो सबसे पूछ रही थीं कि क्या हुआ है? कुछ तो बताओ। लेकिन सब माँ, यानी नंदिनी से यही कह रहे थे कि कुछ नहीं हुआ माँ। तभी उसकी 5 साल की पोती जो बोल नहीं सकती थी वो बार-बार इशारे से दादी को पूछ रही थी  “दादी, आप कहीं जा रही हो क्या ?  
नंदिनी ने अपने बेटे रोहित को देखा। रोहित नज़र बचाकर अपने फ़ोन में देखने लगा। फिर उस बच्ची को फुसलाने के लिए नंदिनी ने कहा, “बेटा, मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं है। डॉक्टर को दिखाने जा रही हूँ। जल्दी आ जाऊँगी।”
रोहित ने नंदिनी के कंधे पर हाथ रख के कहा, “माँ, चलें?” रोहित की पत्नी  उन दोनों को दरवाज़े तक छोड़ने आई। उसने नंदिनी के पैर छुए। नंदिनी को समझ नहीं आया कि ये हो क्या रहा है। वो बिना जवाब दिए चुपचाप कार की तरफ बढ़ गई। रोहित ने नंदिनी का बड़ा सा सूट्केस कार में रखा, नंदिनी जाके कार में बैठ गई और ड्राईवर ने गाड़ी स्टार्ट की। रास्ते में नंदिनी ने कई बार रोहित से पूछा कि वो उसे कहाँ ले जा रहा है, और इतना सामान क्यूँ पैक किया है? लेकिन रोहित अपने फ़ोन पर किसी से बात करता रहा। माँ की बात का जवाब नहीं दिया। ऐसा लग रहा था वो जान बूझ कर उनसे बात नहीं करना चाहता था।
गाड़ी एक ओल्ड ऐज हाउस के पास जाकर रुकी। नंदिनी की नज़र वहाँ पर घूम रहे बूढ़े-बुज़ुर्गों पर पड़ी। नंदिनी समझ गई कि रोहित उसे वहाँ छोड़ने आया है। नंदिनी की आँखों में आंसू आ गए। उसने अपने आंसू पोछे और ओल्ड एज हाउस की तरफ़ देखती हुई बोली, “आज ही यहाँ ले आया? बता तो दिया होता बेटा। मैं अच्छे से मिल तो लेती सबसे। बहू को ढेर सारा आशीर्वाद दे देती, जब उसने मेरे पैर छुए। अपनी पोती को थोड़ा और दुलार लेती।” रोहित कुछ बोल नहीं सका और कार से उतरकर सीधा वहाँ के मैनेजर के पास गया। नंदिनी कार से उतरकर खड़ी हो गई। अंदर से एक आदमी आकर नंदिनी का सारा सामान लेके चला गया। रोहित आया और माँ को मैनेजर के पास ले गया। मैनेजर ने नंदिनी से पूछा, “आप अपनी ख़ुशी से यहाँ आईं हैं ना? कोई ज़बरदस्ती तो नहीं है?”
नंदिनी ने एक बार रोहित की ओर देखा। रोहित झेंप गया और इधर उधर देखने लगा। मैनेजर ने कहा, “मैं समझ गया। अब आप कहेंगी, मेरे बच्चों की ख़ुशी में ही मेरी ख़ुशी है। राइट?” नंदिनी कुछ कह पाती इससे पहले ही मैनेजर ने आगे कहा, “चलिए ठीक है। आजकल घर बहुत छोटे हो गए हैं। क्या कीजिएगा? स्वागत है आपका नंदिनी जी।” मैनेजर ने एक लड़के को आवाज़ लगाई। वो लड़का आया और नंदिनी से बोला, “चलिए माँजी! आपको कमरा दिखा दूँ।”
नंदिनी ने एक बार फिर रोहित को देखा। रोहित ने हड़बड़ी में माँ के पैर छुए और वहाँ से चला गया।
नंदिनी अपने कमरे में गई और काफ़ी देर तक अपने मरे हुए पति को याद करके रोती रही। फिर उसने खुद को संभाला, अपनी क़िस्मत को स्वीकार किया और, दूसरे लोगों की तरह वो भी वहाँ के माहौल में खुद को ढालने की कोशिश करने लगी।
कुछ दिन बीत गए। रोहित का मैनेजर के पास कोई फ़ोन नहीं आया। नंदिनी के पास अपना फ़ोन नहीं था। एक दिन सुबह नंदिनी अपने कमरे में खिड़की के पास खड़ी थी। तभी बगीचे की तरफ उसकी नज़र पड़ी और उसने देखा, एक आदमी बेंच पर बैठा बगीचे में मौजूद कबूतरों को बड़े ध्यान से और काफ़ी देर से देख रहा था। नंदिनी बाहर उसके पास जाकर बैठ गई और कबूतरों की ओर देखते हुए बोली, “कितने सुन्दर होते हैं ना ये पक्षी? जब जी चाहे जहाँ भी उड़ के जा सकते हैं।” उस आदमी ने मुस्कुरा के नंदिनी की तरफ़ देखा।
वो नंदिनी को गौर से देखकर बोला, “आप शायद नई हैं यहाँ पर!”
नंदिनी ने कहा, “हाँ, अभी एक हफ़्ता हुआ है। आज पहली बार कमरे से बाहर निकली हूँ।”
उस आदमी ने हँसकर कहा, “वही तो मैं सोच रहा था कि मेरी नज़र कैसे नहीं पड़ी आप पर?”
नंदिनी की भौहें सिकुड़ गईं। उसने कहा, “तो क्या आप सब पर नज़र रखते हैं यहाँ?”
वो आदमी ज़ोर से हँस पड़ा और बोला, “हाहा! अरे, मेरे कहने का मतलब वो नहीं था। दरअसल मुझे यहाँ चार साल हो गए हैं, तो यहाँ की हर चीज़ से मैं बहुत अच्छे से परिचित हूँ। सभी को बहुत अच्छे से जानता हूँ। मुझे तो यहाँ तक पता है कि…” वो आदमी रुका और नंदिनी के कान के पास जाकर फुसफुसा कर बोला, “यहाँ के मैनेजर का एक गेस्ट सुनीता से चक्कर भी चल रहा है। रात में जब सब सो जाते हैं, तब वो दोनों यहीं इस बेंच पर बैठ के एक दूसरे को खाना खिलाते हैं। और मैनेजर बाबू हर रोज़ सुनीता को बगैर एक कहानी सुनाए जाते नहीं हैं। खैर… मुझे बहुत अच्छा लगता है दोनों को एक साथ देख के। पता है एक बार बड़ा मज़ा आया। एक रात दोनों बिल्डिंग के पीछे बैठे बात कर रहे थे, और सुनीता को मैनेजर की किसी बात पे बहुत तेज़ हँसी आ गई। वो हँसी सुन के कुछ लोग जग गए थे। हम बुड्ढों की नींद वैसे भी कच्ची होती है। हाहा… तो फिर सबको लगा कि कोई चोर आ गया है। सब तरफ की लाइट्स जल गईं। उस वक्त मैंने देखा कि मैनेजर और सुनीता एक पेड़ के पीछे ऐसे छुपे थे जैसे बचपन में बच्चे छुपन-छुपाई खेलते हैं।”
नंदिनी ये क़िस्सा सुन के ज़ोर से हँस पड़ी। फिर अचानक बोली, “अरे आपका नाम तो बताइए। हमने इतनी बातें कर लीं और नाम ही नहीं पूछा।”
उस आदमी ने कहा, “मैं… राजेश ताम्बे, पुणे से हूँ। और मुझे लगता है कि आपका भी कोई तो नाम होगा ही!”
नंदिनी मुस्कुरा के बोली, “जी, मेरा नाम नंदिनी त्रिवेदी है। मैं मुंबई से हूँ।”
फिर राजेश ने बताया कि उसकी पत्नी इस दुनिया में नहीं हैं। और उसका बेटा बाहर विदेश में रहता है। तो जब तक बेटा पुणे में था, तब तक तो बाप-बेटा ही एक दूसरे की देखभाल करते थे। लेकिन जब बेटे की विदेश में नौकरी लग गई तो मजबूरन राजेश को ओल्ड एज हाउस में आना पड़ा।
बताते बताते राजेश उदास हो गया। फिर बोला, “वैसे यहाँ मेरे बहुत सारे दोस्त बन गए हैं। मन लगा रहता है। हाँ, बस बेटे से रोज़ बात नहीं हो पाती। शायद टाइम नहीं मिलता होगा उसे। खैर छोड़ो नंदिनी जी… आप यहाँ कैसे?”
नंदिनी ने कहा, “मेरा बेटा और बहू दोनों नौकरी करते हैं। उन दोनों की एक छोटी सी बेटी भी है। तो अब वो काम करें या मेरी देखभाल करें? तो बस… इसलिए मैंने भी सोचा कि…”
“बस बस, मैं समझ गया।” राजेश ने बीच में ही टोकते हुए कहा।
कई दिन बीत गए। अब नंदिनी का मन भी राजेश की वजह से वहाँ लगने लगा था। राजेश बहुत हँसमुख और मिलनसार क़िस्म का आदमी था। वो नंदिनी का पूरा ध्यान रखता था। रोज़ सुबह की चाय दोनों साथ पीते, फिर काफी देर तक बातें करते थे। शाम को दोनों साथ में वाक पर भी जाते थे।
एक शाम राजेश नंदिनी को वाक पर ले जाने के लिए उसके कमरे में आया तो नंदिनी ने बताया कि उसकी तबियत ठीक नहीं है। राजेश ने पास जाकर नंदिनी का हाथ छुआ तो वो बहुत गरम था। राजेश ने कहा, “आपको तो बुख़ार है। दवा ली आपने?” नंदिनी ने ‘ना’ में जवाब दिया। राजेश बोला, “मैं अभी लेके आता हूँ।”
नंदिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया। राजेश ने उसे देखा। फिर नंदिनी ने उसका हाथ छोड़ दिया और बोली, “सॉरी! मेरा मतलब था कि आप कहीं जाइए मत! दवा मेरे बैग में है।”
राजेश नंदिनी का बैग खोल के दवा ढूँढने लगा। उसकी नज़र बैग में रखी एक डायरी पर पड़ी। उसने पल भर को उस डायरी को देखा। फिर चुपचाप दवा निकालकर नंदिनी को दिया और बोला, “आप आराम करो अभी। और किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो बताना। मैं बाहर ही बैठा हूँ।” राजेश बाहर चला गया।
राजेश सरकारी स्कूल से रेटायअर्ड टीचर था। वो बाहर बैठा अंदर ही अंदर बड़ा बेचैन हो रहा था। सोच रहा था, “क्या ये वही चुलबुली टीचर नंदिनी है? जिसको मैंने स्कूल में डायरी गिफ्ट की थी?” वो सोचता रहा और 35 साल पहले वाली नंदिनी का चेहरा याद करके इस 65 साल की नंदिनी से मिलाने की कोशिश करता रहा।
दो दिन लगातार वो नंदिनी की सेवा करता रहा। नंदिनी की तबियत में सुधार होने लगा था। नंदिनी एक शाम अपने कमरे में बैठी चाय पी रही थी। तभी राजेश अपने हाथ में एक किताब लिए दरवाज़े पर आया और बोला, “नंदिनी जी, क्या मैं अन्दर आ सकता हूँ?”
नंदिनी ने कहा, “अरे, राजेश जी, आइए ना!” राजेश अंदर आकर नंदिनी के पास एक कुर्सी पर बैठ गया। नंदिनी ने किताब की ओर देखा।
राजेश ने कहा, “मुझे चाँद चाहिए। ये… मेरी सबसे पसंदीदा किताब है। ये मैंने स्कूल के समय में बहुत बार पढ़ी है। दिव्या कात्याल, वर्षा वशिष्ठ, ये दोनों मेरे चहेते किरदार हैं इस उपन्यास के।”
नंदिनी के मुँह से निकला, “राजेश, आपको पता है ये उपन्यास…”
लेकिन राजेश ने उसकी बात काट कर कहा, “नंदिनी, तुम्हारे बैग में क्या वो वही डायरी है जो… तुम्हारे स्कूल के एक टीचर ने तुम्हें दी थी?” कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा हो गया। नंदिनी चौंक गई। दोनों कुछ देर चुपचाप एक दूसरे को देखते रहे।
नंदिनी ने हिचकिचाते हुए कहा, “हाँ, मैं जिस स्कूल में पढ़ाती थी… वहीं पर… एक टीचर ने मुझे गिफ्ट में दी थी। एक बार स्कूल में जब लंच टाइम पर सारे टीचर स्टाफ रूम में लंच कर रहे थे… तब बातों बातों में मैंने उन्हें बताया था कि मुझे डायरी लिखने का बहुत शौक है। ये बात सुन के उस टीचर ने मुझे मेरे बर्थडे पर वो डायरी गिफ्ट में दी थी और ये… इस उपन्यास के किरदारों की बात जैसे आपने कही, वैसे ही उन्होंने भी मुझे बताई थी। कमाल का इत्तेफ़ाक है ना! और फिर कुछ दिनों बाद उनकी वाइफ की डेथ हो गयी थी, जिस वजह से उन्हें स्कूल छोड़कर पुणे जाना पड़ा। वो मुझे पसंद करता था शायद…” नंदिनी ने एक गहरी साँस ली।
राजेश मुस्कुराया और बोला, “वो तुम्हें आज भी पसंद करता है नंदिनी।”
नंदिनी ने गौर से देखा राजेश के चेहरे को। वक़्त की झुर्रियों के पीछे वो वही कत्थई आँखें थीं, जो स्कूल के दिनों में उसे छुप छुप के देखा करती थीं। नंदिनी को यकीन नहीं हो रहा था कि ये वही राजेश है। राजेश ने तो नंदिनी को पहले ही पहचान लिया था। आज वक़्त ने एक जैसी तकलीफ़ से जूझते दो इंसानों को एक दूसरे के करीब ला दिया था। एक अलग से, एक ख़ूबसूरत से एहसास में दोनों डूब चुके थे। लेकिन उनकी ज़िंदगी की डूबती नाव को तो जैसे साहिल मिल गया हो। राजेश ने नंदिनी के दोनों हाथों को अपने हाथ में लिया। वो कुछ कहने ही जा रहा था कि तभी मैनेजर उनके कमरे में आया और मुस्कुरा के बोला, “लग रहा है ज़िंदगी के टेस्ट मैच की दूसरी पारी की तैयारी हो रही है। चलिए, लंच का वक़्त हो गया है। लंच के बाद शुरू कीजिएगा, दूसरी पारी।” दोनों खाना खाने चले गए। खाना ख़तम होने के बाद नंदिनी मीठी दही की कटोरी लेकर राजेश के पास आई, और अपने हाथ से राजेश को एक चम्मच दही खिलाते हुए बोली, “नए काम की शुरुआत दही शक्कर खा के करनी चाहिए। काम शुभ होता है।” दोनों मुस्कुराए। और तभी चारों तरफ़ से तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। मैनेजर के साथ उस ओल्ड एज हाउस के सारे बुज़ुर्ग और काम करने वाले लोग नंदिनी और राजेश के लिए तालियाँ बजा रहे थे। जैसे किसी बहुत सुंदर सी फ़िल्म की हैपी एंडिंग हुई हो। या शायद… एक बहुत ख़ूबसूरत फ़िल्म की शुरुआत…


The End

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