यात्रा की खिड़की 

कुछ सुबह बहुत ही सुंदर होती हैं ... आँख खुलने पर सबकुछ बहुत ही शांत महसूस होता है कहीं जाने की जल्दी नहीं होती सबकुछ महसूस होता है बहुत देर तक बिना कुछ बोले बस किसी एक चीज़ को एक टक देखते रहना... कितना सुखद होता है वो पल ... जैसे आज की सुबह सब कुछ बहुत ही शांत है जब कि मेरे आस - पास लोगों को जमावड़ा है और सभी सो रहे हैं और मैं अकेला जग रहा हूँ, बाहर अलसाई हुई सुबह धीरे-धीरे जग रही है...ट्रेन का हॉर्न बज रहा है.... मैं सीट पे लेटा हूँ और बाहर देख रहा हूँ हर सेकंड्स में जैसे चित्र पे चित्र बदलते जा रहे है .... जैसे बचपन में गाँव में बाइस्कोप वाला आता था और उसकी रील से हम एक सेकंड्स में हम इंडिया गेट से गेटवे ऑफ़ इंडिया... गेटवे से पेरिस के Eiffel tower पे पहुँच जाते थे और ...Eiffel Tower से Spain के La Concha beach पर..... ठीक वैसे ही अभी मुझे महसूस हो रहा है जैसे हर एक सेकंड्स में एक चित्र से दूसरे चित्र में जैसे हम प्रवेश कर रहे हैं ...और कभी -कभी अगर बीच में ट्रेन आ गई तो जैसे भ्रम टूट जाता कि ये बाइस्कोप तो नहीं है.... और फिर जब तक ट्रेन गुजर नहीं जाती मैं दूसरी ट्रेन में किसी को देख के मुस्कुराने या हेलो बोलने को कोशिश करता तब तक वो ट्रेन गुजर जाती और वापिस से वो चित्र मेरे सामने आ जाते...... दोनों ट्रेन इतनी तेज़ रफ़्तार में होती है कि सब धुँधला नज़र आता....रास्ते में बहुत सारे छोटे स्टेशन भी पड़ते हैं I feel station is like entry point of any city or village .... छोटे छोटे स्टेशन एक क़िस्से की तरह होते हैं... बीच के स्टेशन शहर की तरह... और बड़े स्टेशन महानगर की तरह बेतहाशा भीड़....... मैं भी एक यात्रा पे हूँ जैज़ म्यूजिक के साथ और अपनी कॉफ़ी के साथ ....यात्रा ये शब्द बहुत ही प्यारा लगता है ट्रेन की यात्रा मुझे पसंद है लेकिन लंबी यात्रा होनी चाहिए साइड लोअर विंडो वाली सीट के साथ आज की सुबह मैं ट्रेन में उठा और ये सुबह बहुत ही सुंदर है .... मुझे साइड की सीट हमेशा से पसंद थी और इत्तेफाक मुझे वही सीट मिली....यात्राएँ बहुत कुछ सिखाती है... बाक़ी फिर कभी यात्रा की खिड़की से......  

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